पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम् 28
६.साहीकंटक
साही एक
जंतु का नाम है,जो बड़े विलाव जैसा होता है,किन्तु इसका मुंह(थुथने)कुत्ते की तरह
होता है,और पैर विल्ली से भी कुछ ठिगने कद का- ठीक विलायती कुत्ते जैसा।साही सियारों
की तरह मांद में रहना पसंद करता है,भले ही वह उसका खुद का बनाया हुआ न हो।देहातों
में, जहां आसपास जंगली वातावरण की भी सुविधा है,ईंट के पुराने भट्ठों में या भवन
के खण्डहरों में इसे देखा जा सकता है।मूलतः मांसाहारी होते हुए भी, शाकाहार इसे
काफी पसन्द है; यही कारण है कि ककड़ी-खरबूजे आदि इसे बहुत भाते हैं।वनजारे इसका
शिकार करना खूब पसन्द करते हैं।किन्तु प्राकृतिक संरचना इसकी ऐसी है कि डंडे के
लाख चोट भी इसे जरा भी घायल नहीं कर सकते।इसके शरीर पर दो अंगुल से लेकर बित्ते भर
तक के लम्बे, मोटे-पतले, कलमनुमा गोलाई वाले,काफी मजबूत असंख्य कांटे होते हैं,जो
आपातकाल की स्थिति भांपते ही सीधे तन कर खड़े हो जाते हैं,और वार बचा लेते
हैं।सामान्य स्थिति में ये सुप्त रोयें जैसे पड़े रहते हैं- ठीक वैसे ही जैसे भय
या ठंढ की स्थिति में हमारे शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं,और सामान्य अवस्था
में शरीर पर चिपके से रहते हैं।
प्राचीन काल में,जब आज का फाउन्टेनपेन नहीं
था,मोर के पंख, या फिर इस साही नामक पशु के कांटों का उपयोग लेखनी के रुप में होता
था।मोटे-पतले, अलग-अलग लिखावट के लिए अलग-अलग आकार के कांटों का उपयोग किया जाता
था।ये कांटे प्राकृतिक रुप से काले-सफेद, दोनों ओर से नोकदार हुआ करते हैं,जो देखने
में बड़े सुन्दर लगते हैं।
यज्ञोपवीत-संस्कार में अब तो लोग भूलते जा
रहे हैं,किन्तु वटुक के शिखा-क्षौर में शिखाक्षेत्र को पांच खण्डों में विभाजित
करने हेतु कुशा और साही-कंटक का अनिवार्य रुप से प्रयोग का विधान है।इसी साही-कंटक
से खण्ड करते हुए,बीच में कुशा बांध दिया जाता है,जिसे तत्काल पिता/गुरु द्वारा
छिंदित किया जाता है।
साही
के कांटे जड़ी-बूटी की दुकानों पर आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं- बहुत ही कम कीमत
में।किसी भी नवरात्रि के पूर्व(आमावश्या की रात्रि या संध्या काल में) इसे क्रय कर
घर ले आयें।गंगाजल से शुद्ध कर आदर पूर्वक नवीन लाल वस्त्र का आसन देकर रख
दें।अगले दिन से अन्य तान्त्रिक पदार्थों की तरह इसे पंचोपचार पूजन करें- पूरे
नवरात्रि भर।साथ ही देवी-नवार्ण मंत्र का ग्यारह माला जप भी नित्य करते रहें। दिन
में आपका जो भी नवरात्रि सम्बन्धी योजना हो करते रहें,कोई हर्ज नहीं।इस
साही-कंटक-क्रिया को रात्रि में ही करें(निशीथ काल में) तो ज्यादा अच्छा है।एक साथ
एक,तीन,पांच,सात,या नौ कांटों को साधित कर सकते हैं।नौ दिनों के पूजन और जप,होमादि
से क्रिया सम्पन्न हो जायेगी।कांटा प्रयोग के योग्य हो जायेगा। आगे प्रयोग के समय
पुनः कुछ मंत्रजप(प्रयोज्य नाम सहित) करना पड़ेगा।
साधित साही-कंटक-लेखनी से किसी भी
षटकर्म-यन्त्र को लिखने से अद्भुत लाभ होता है।सामान्य लेखनी, अनार की
लेखनी,मयूरपिच्छलेखनी आदि की तुलना में साही-कंटक-लेखनी का अपना अलग महत्त्व है।
इसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य है- विद्वेषण और
उच्चाटन।इसमें इसे महारथ हासिल है।पुराने लोग तो डर से साही का कांटा अपने घर में
रखना भी नहीं चाहते थे,कि परिवार में लड़ाई-झगड़े होंगे।वैसे काफी हद तक यह सच भी
है।सामान्य तया किसी को साही-कांटा अपने घर में रखने का सुझाव तो नहीं ही दूंगा-
क्यों कि विद्वेषण इसका द्राव्यिक गुण है।साधित हो जाने पर तो कहना ही
क्या।हां,साधकगण- जो विभिन्न तान्त्रिक वस्तुओं को सदा अपने पास रखा करते हैं,उनकी
बात कुछ और है।अपनी साधना-बल से रक्षित रहते हैं।
पुनश्च,सावधान करना चाहूंगा कि कोई भी प्रयोग
स्वार्थ और लोभ के वशीभूत होकर न करें। अन्यथा
भारी
कीमत चुकानी पड़ेगी। शास्त्र का सदुपयोग लोक कल्याण के लिए हो।
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