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समुद्र-मन्थन का आध्यात्मिक रहस्य

     समुद्र-मन्थन का आध्यात्मिक रहस्य समुद्र-मन्थन की प्रसिद्ध पौराणिक कथा से परिचित अवश्य होंगे—सौतेले-मौसेरे भाई महर्षि कश्यप की सन्तानें—देव, दानव, दैत्यादि अपने-अपने वर्चश्व और अधिकारों के लिए प्रायः आपस में जूझते ही रहते थे। किसी न किसी बहाने इनके   बीच युद्ध होते ही रहता था। विविध शस्त्रास्त्रों से भीषण युद्ध होगा तो किसी न किसी का मरना तय है। किसी एक पक्ष का पराजय भी तय है। अपनों के मत्यु से दुःखी देवगण ने विचार किया कि किसी तरह हमें अमरत्व मिल जाता तो बड़ा अच्छा होता। किन्तु इसके लिए, जो उद्योग करना पड़ेगा, वह अकेले सम्भव नहीं है, दैत्य-दनुजों का साथ भी अपरिहार्य है।   ऐसे में समस्या ये खड़ी हुई कि संयुक्त प्रयास से प्राप्त होने वाले अमरत्व की व्यवस्था में वे यानी देवों के शत्रु दैत्यादि भी भागीदार अवश्य हो जायेंगे।   प्रयास संयुक्त होगा, तो अमरता भी संयुक्त ही होगी । यानी वे भी अमर हो जायेंगे। परिणामतः स्थिति ज्यों की त्यों बनी रह जायेगी, बल्कि इससे भी विकट ही हो सकती है। कहने को देवता हैं, किन्तु बड़े ही स्वार्थान्ध हैं, कुटिल विचार वाले त...

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