पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम् - 3
तृतीय परिच्छेद - वनस्पति त्तन्त्र प्रयोग
श्वेतार्क(मन्दार)
मन्दार एक बहुपरिचित पौधा है।संस्कृत में इसे अर्क भी कहते हैं।अर्क
सूर्य की संविधा है।यह शिव का अतिप्रिय पुष्प है।इसकी कई प्रजातियाँ हैं।मुख्य रूप
से नीले और सफेद फूलों के भेद से पहचाना जाता है।एक और खास बात ये है कि बनावट के
विचार से छोटे और बड़े आकार में मिलने वाले दो पौधे हैं,जो वस्तुतः दो विलकुल
भिन्न जाति के है। एक को अकवन के नाम से जाना जाता है।इसका विकास क्रम मदार से
किंचित भिन्न है।प्रायः लोग दोनों को एक ही समझ लेते हैं,जब कि जाति एक और प्रजाति
भेद है।गुण-धर्म में भी भेद स्वाभाविक है।अकवन(अर्क)जड़ से ही बहुशाखा वाला होता
है,जव कि मदार में शाखायें अपेक्षाकृत कम होती हैं।अकवन साल दो-साल में प्रायः सूख
जाता है,किन्तु मदार बहुबर्षायु पौधा है।अकवन में सिर्फ शाखायें ही शाखायें होती
हैं,जब कि मदार तना युक्त होता है।पुराना पड़ने पर काफी मोटा और 10-15 फीट ऊँचा हो
जाता है। गोस्वामी जी ने वर्षाऋतु वर्णन क्रम में कहा है-
अर्क,जवास पात विनु भयऊ।जिमि सुराज खल
उद्यम गयऊ।।
तात्पर्य
यह कि वरसात में सभी पेंड़-पौधे लहलहाने लगते हैं,जब कि अर्क और जवास प्रायः सूख
जाते हैं।इनकी पत्तियाँ झड़ जाती हैं।आमतौर पर रेलवे लाईनों के किनारे,या
जहाँ-तहाँ किसी पुराने मकानों के ढूह पर पाया जाता है।इसके पत्ते वरगद के पत्ते
जैसे आकार के होते हैं।रंग में थोड़ा फर्क होता है।बैंगनी फूलों वाला मदार तो
बहुतायत से पाया जाता है,किन्तु सफेद फूल की प्रजाति जरा दुर्लभ है।
यहाँ मेरा विवेच्य वनस्पति श्वेतार्क(मदार)
ही है।क्षुप जातिय अकवन या नीले फूलों वाला मदार नहीं।
मदार पुष्प शिव को अतिशय प्रिय है- इसके पीछे
एक कारण यह भी है कि इस पौधे में पार्वती नन्दन गणेश का वास है।गीता (विभूतियोग)में
श्रीकृष्ण ने स्वयं को अश्वत्थ(पीपल) कहा है। तदभांति मन्दार गणेश की साक्षात्
विभूति है।लोककल्याण के लिए विघ्नेश्वर विनायक मन्दार के रूप में अवतरित हुए हैं-
ऐसा तन्त्र-ग्रन्थों में वर्णित है। अति चमत्कारिक बात यह है कि मन्दार मूल को आप
निर्विघ्नता पूर्वक(विना कटे-टूटे) यदि जमीन से ऊखाड़ कर गौर करें तो पायेंगे कि
साक्षात् मंगल मूर्ति की तरह नजर आएगा।
यहाँ हम मन्दार के विभिन्न प्रयोगों की चर्चा
करेंगे,जिनमें ज्यादातर श्वेतार्क मूल का ही प्रयोग है।इसके लिए पौधे का बहुत
पुराना(मोटा)होना जरुरी नहीं है।हाँ,ये बात अलग है कि पौधा जितना ही पुराना होगा-
उसका मूल उतना ही सुदृढ़-सुव्यवस्थित-सुन्दर आकृति वाला होगा।
श्वेतार्क गणपति और स्वर्ण-निर्माण
एक सर्वाधिक रोचक और चमत्कारी प्रयोग है-
स्वर्ण-निर्माण का।इसमें वृक्ष को नष्ट करने की बात नहीं है।प्रत्युत वृक्ष जितना
ही पुराना और मोटा होगा क्रिया में आसानी होगी। दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह
है कि इस क्रिया की व्यावहारिक कठिनाई है-यह एक दीर्घकालिक अनुष्ठान है।साधक के
निज साधना बल के अनुसार पांच,सात,दश,या बारह वर्ष लग सकते हैं।सीधे कहें कि इस
साधना में तैयारी से लेकर पूर्णता तक
पहुंचने में जीवन ही खप जाने जैसी बात है।बहुत धैर्य की आवश्यकता है।साथ ही
यह बहुत गुप्त और रहस्यमयी साधना है।आपकी थोड़ी असावधानी(क्रिया-त्रुटि और
गोपनीयता भंग) आपके दीर्घकालिक श्रम पर पानी फेर सकता है। मैं स्वयं इसका
भुक्तभोगी हूँ।मेरे गुरुजनों ने भी इसे साधा है।
इस क्रिया के लिए प्रथम अनिवार्यता है कि कहीं से
इसका बीज या गाछ उपल्बध करें,और अपनी गृह-वाटिका में स्थापित करें- इस बात का
ध्यान रखते हुए कि इसके पास
बैठ
कर लम्बी साधना करनी है।अतः भविष्य-विचार पूर्वक पौधा लगाने का स्थान चयन
करें।पांच-सात वर्षों में क्रिया-योग्य पौधा तैयार हो जायेगा।वस्तुतः इस प्रयोग
में मोटे तने की आवश्यकता है।तना जितना मोटा होगा,साधक के लिए उतना ही उपयोगी और
लाभप्रद होगा।
उचित होगा कि योजनावद्ध रुप से पौधे की
स्थापना कर देखभाल करते रहें,और इस बीच अपने कायिक शुद्धि के साथ अन्यान्य साधना
करते रहें,या सामान्य जीवन- क्रिया-कलापों में गुजारें।पुत्र जन्म से लेकर कमाऊ
बनने तक की प्रतीक्षा हर कोई करता है- और बड़े शौक और लगन से करता है।फिर इस चमत्कारी
क्रिया के लिए प्रतीक्षा में क्या हर्ज ? वैसे सच पूछा जाय तो इस लम्बी साधना का
परिणाम सांसारिक भोग साधना बहुल ही है। अतः इसके प्रति साधक को विशेष आकर्षित नहीं
होना चाहिए।अन्य अल्पकालिक साधना-प्रयोगों से ही संतोष करना चाहिए।
अस्तु।पौधा कार्य-योग्य हो जाने पर रविपुष्य/गुरूपुष्य
योग में प्राण-प्रतिष्ठा-विधि से प्रतिष्ठित कर यथा सम्भव पंचोपचार/षोडशोपचार पूजन
करें।भगवान गणपति के बारह प्रसिद्ध मंत्रो में स्वेच्छा से किसी मंत्र का चुनाव कर
लें।उस चयनित मंत्र से ही पूजन करना है। पूजा के बाद एकाग्रचित होकर क्षमा याचना
करें,और अपना अभिष्ट उन्हें स्पष्ट करें।
पूजन सामग्री में अन्य सामानों के अतिरिक्त-
शुद्ध पारद एक पाव,लाल कपड़ा चौथाई मीटर,कच्चा गोदुग्ध एक पाव,वरगद का एक सुन्दर
पत्ता,सौ ग्राम शुद्ध मोम(मधु मक्खी वाला- ये आपको जड़ी-बूटी की दुकान में मिल
जायेगा),वृक्ष में छेद करने के औजार- मोटा बरमा,तेज चाकू,रुखानी आदि साथ रखना
आवश्यक है।मोटे तने में सर्वप्रथम मोटा बरमा से छेद करें- छेद इतना ही हो कि तने
में आर-पार न हो जाय(मोटाई का तीन हिस्सा ही छेदा जाय)।बरमा से निकल रहे कुन्नी
(बुरादा) को प्रेम पूर्वक किसी पात्र में एकत्र कर लें,क्योंकि आगे इसका उपयोग
करना है। अब किए गये छिद्र को किसी दूसरे औजार से थोड़ा और बड़ा करें।छेद विलकुल
सुडौल हो- इसका ध्यान रखें।अब किए गये छिद्र में सावधानी पूर्वक,साथ लाये गये पारद
को भर दें।ध्यान रहे- पारद अति चंचल द्रव्य है।इसे हाथों से पकड़ना कठिन है।अतः
वरगद के पत्ते को कुप्पीनुमा बनाकर,छिद्र में पारद भरने का काम करें।छिद्र
थोड़ा(एक ईंच) खाली रहे,तभी पारद डालना बन्द कर दें।यदि पारद बचा रह जाय तो कोई
हर्ज नहीं।अब, छेद करते समय निकले बुरादे में मधुमक्खी वाला मोम मिलाकर उस शेष छेद
में सावधानी पूर्वक भर दें।उपर से लाल कपड़े को चार-पांच बार लपेट कर पट्टीनुमा
बन्धन कर दें।हाँ,पौधे के थल में छःईंच गोल घेरा बना दें,जिसमें आसानी से नित्य जल
डाला जा सके।अब,पुनः आसन लगाकर पूर्व साधित- गणपति मन्त्र का ग्यारह माला जप
करें।जप के लिए रुद्राक्ष माला सर्वोत्तम है।जप पूरा हो जाने पर किए गये जप-पूजन क्रियादि
को ऊँ श्री गणपत्यर्पण मस्तु- कह कर पुष्पाञ्जली दे दे।तत्पश्चात गोदुग्ध का
अर्घ्य अर्पिच करे। इस प्रकार प्रथम दिन की क्रिया सम्पूर्ण हुयी।
अब,नित्य पंचोपचार पूजन,ग्यारह माला पूर्व साधित गणपति
मन्त्र-जप,दुग्धार्घ्य, पुष्पाञ्ली,और समर्पण की क्रिया करते रहना है- लम्बे समय तक।
ध्यान रहे- यह एक दीर्घकालिक अनुष्ठान है।आपके
भाग्यानुसार और कर्म की सघननतानुसार फल में समय लगेगा।एक बर्ष से बारह बर्ष- कुछ
भी लग सकता है।प्रयोग शतानुभूत है,इसमें जरा भी संशय नहीं। आप नियमित रुप से अपनी
क्रिया जारी रखें। क्रिया दीर्घकालिक है।सांसारिक जीवन में कई तरह के व्यवधान
आयेंगें।परिवार-गोत्रादि में जनना शौच,मरणाशौच भी होंगे ही।रोग-बीमारी भी सतायेगी
ही।ऐसी परिस्थिति में अनुष्ठान क्रिया किंचित बाधित होगी।जननाशौच में नौ दिन,एवं
मरणाशौच में बारह दिनों तक क्रिया बन्द रहेगी।रोग-बीमारी की विशेष स्थिति में भी
बाधित हो सकता है,जो सर्वथा क्षम्य है। वस इतना ही ध्यान रहे कि आलस्य,लापरवाही और
नैराश्य का शिकार न हों।
प्रयोग
सिद्धि का संकेत-
क्रिया
करते-करते आप देखेंगे कि मन्दार-वृक्ष की पत्तियाँ जो स्वाभाविक रूप से थोड़ा
भूरापन लिए हरे रंग की थी,अव धीरे-धीरे अपना रंग बदलने
लगी
हैं।पत्तियाँ पहले बीमार पत्तियों
की तरह पीली लगेंगी।फिर उनके झड़ जाने पर,नयी पत्तियाँ नये कलेवर में होंगी- पीतल
या सोने जैसी अद्भुत चमक वाली।वस,इसी की प्रतीक्षा थी आपको।आपका कार्य सिद्ध हो
गया।अब,पुनः रविपुष्य/गुरुपुष्य योग का विचार करके अनुष्ठान समाप्ति का संकल्प
करें।पूर्व क्रम से पूजन,जपादि नित्य क्रिया सम्पन्न करके,वृक्ष को सादर दण्डवत
करें।लपेटी हुयी लाल पट्टी को खोल दें।किसी औजार से छिद्र में भरे गये बुरादे को
आहिस्ते से अलग करें,और उसके अन्दर पूर्वकाल में भरे गये पारद को बाहर निकालें।आप
देख कर चमत्कृत हो जायेंगे- यह पारद नहीं,शतप्रतिशत शुद्ध सुवर्ण है। श्रद्धा
पूर्वक उसे माथे से लगायें,और सामने रखे गये किसी पात्र में(स्टील नहीं) रख कर
विधिवत षोडषोपचार पूजन करें।उसमें से (कम से कम सवा तोला) किसी गरीव को दान कर दें।और
शेष को आदर सहित अपने खजाने में रख दें। एक काम और करना अति आवश्क है- कम से कम
पांच ब्राह्मण और पांच भिक्षु को भोजन करायें,और श्रद्धानसार उन्हें दक्षिणा दें।
नोटः- (१)
इस क्रिया का वैज्ञानिक आधार- इस प्रयोग में पारद को तान्त्रिक विधि से
स्वर्ण में परिवर्तित कर रहे हैं।लौह आदि अन्यान्य धातुओं को भी तान्त्रिक विधि से
परिवर्तित किया जा सकता है।किन्तु पारद का परिवर्तन अपेक्षाकृत आसान है।वैज्ञानिक
विवेचन करें तो कहा जा सकता है कि पदार्थों के परिवर्तन के लिए उसके
इलेक्ट्रोन-प्रोटोन ही जिम्मेवार होते हैं।पदार्थ और ऊर्जा का ही खेल है यह
बहुआयामी ब्रह्मांड।प्राकृतिक रूप से यह परिवर्तन(Transmutation) नित्य-निरंतर जारी है। सामान्य जन के लिए
यह महद् आश्चर्य की बात हो सकती है,किन्तु एक वैज्ञानिक जानता है कि वृक्ष(लकड़ी)
ही भूगर्भ में दब कर कोयला बनता है, और फिर कोयला ही हीरे में बदलता है।कोयले और
हीरे में वैज्ञानिक दृष्टि से बहुत साम्य है- दोनों कार्बन ही हैं। पारद और सोना भी
एक दूसरे के बहुत करीब हैं।इनके इलेक्ट्रोन-प्रोटोन काफी करीब हैं।सोने का अण्वांक ७९,और पारद
का ८० है।यानी किसी विधि से पारद का अण्वांक घटा दिया जाय ,तो वह सोना हो जाय।यही
कारण है कि परिवर्तन आसान है।वैज्ञानिक-प्रयोगशाला
में इन क्रियाओं को जाँचा-परखा गया है।इस तरह के रासायनिक और भौतिक परिवर्तन में जरा
भी संशय नहीं है।
तन्त्र-मन्त्र भी कुछ ऐसा ही कर रहा है,जो
कार्य प्रकृति अपनी नियत गति से निरंतर करती आरही है।तन्त्र-मन्त्र कैसे कार्य
करता है- इन सिद्धान्तों का विवेचन आप हमारी पुस्तिका- पुण्यार्कतन्त्रप्रदीपिका
में देख सकते हैं।यहाँ सिर्फ इतना ही कह दें कि ऑक्सीजन और हाईड्रोजन के अणु आपस
में मिल कर जल का निर्माण करते हैं,उसी भांति पारद मन्दार-दूध से लम्बे समय तक
संयोग करते-करते स्वर्ण में बदल जाता है। प्रयोगशाला का विशिष्ट परिवेश और उपकरण जैसे
कार्य संयोग करते हैं, वैसे ही यहाँ मन्त्र क्रिया और निरंतर मंत्रपूरित गोदुग्ध
का सिंचन पारद में रासायनिक परिवर्तन ला देता है। ध्यातव्य है कि वैज्ञानिक सिद्ध
है कि गाय के दूध में स्वर्णशक्ति भी मौजूद है।गाय के मेरुदण्ड से कुछ विशिष्ट रसायन
निरंतर श्रवित होते रहते हैं,जो सोने के गुण वाले हैं।ओज-वृद्धि के लिए आयुर्वेद स्वर्ण-भस्म
खाने का सलाह देता है।सामान्य जन जो इस मंहगी दवा का सेवन नहीं कर सकते,वे नियमित रुप
से गोदुग्ध सेवन करके लाभ पा सकते हैं। किन्तु यहाँ भी एक बड़ा शर्त है- देशी नस्ल
की गाय,क्यों कि उसके मेरुदण्ड में ही यह गुण है;आजकल की जर्सी(Crossbride)गायों में नहीं।अस्तु।
(२) तन्त्र-ग्रन्थों में स्वर्ण निर्माण की कई
विधियाँ दी गयी हैं।योग साधना से भी ये सब चमत्कारिक सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो
सकती हैं।किन्तु साधक को सदा इनसे परहेज करना चाहिए।सामान्य जीवन यापन हेतु कुछ
हल्के-फुल्के प्रयोग भले ही कर ले।
(३) यह
प्रयोग पूर्णतया गणपति का है।गणेश साक्षात् कृष्ण ही हैं।कृष्ण यानी विष्णु। मूलतः
यह वैष्णवी क्रिया है।इसकी मर्यादा का ध्यान रखते हुए,मांसाहारी लोग इस
साधना-प्रयोग को कदापि न करें।उन्हें इसकी सिद्धि कदापि नहीं मिल सकती।उनका श्रम
और समय व्यर्थ जायेगा।कुछ अन्य बाधायें झेलनी पड़ेंगी सो अलग।
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